दुर्गेश साहू, धमतरी। एक तरफ गंगरेल बांध को छत्तीसगढ़ की जीवनरेखा कहा जाता है, जहां से हजारों गांवों और शहरों तक पानी पहुंचता है। दूसरी ओर उसी जलाशय के किनारे बसे गांव आज भी पीने के पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। धमतरी जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम पंचायत कोड़ेगांव के आश्रित गांव कोसमी की तस्वीर सरकारी योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर दिखा रही है। गंगरेल डुबान क्षेत्र के किनारे बसे इस गांव तक पहुंचना आज भी आसान नहीं है। ग्राम पंचायत से करीब 7 से 10 किलोमीटर दूर जंगल, पहाड़ और कच्चे रास्तों से होकर गांव पहुंचना पड़ता है। सड़क सुविधा लगभग नहीं के बराबर है। बरसात और आपात स्थिति में यह इलाका लगभग कट जाता है। सबसे बड़ी समस्या पीने के पानी को लेकर है। गांव में नल-जल योजना के तहत दो बड़ी पानी टंकियां बनाई गईं, घर-घर नल कनेक्शन भी लगाए गए, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि योजना कुछ समय चलने के बाद बंद हो गई और अब सिर्फ ढांचा बनकर रह गई है। ग्रामीणों के मुताबिक, कई बार शिकायत के बाद भी न तो बंद पड़ी टंकियां चालू हुईं और न ही नियमित जलापूर्ति शुरू हो सकी। हालत यह है कि गांव के लोग आज भी गंगरेल डुबान क्षेत्र से पानी लाकर पीने को मजबूर हैं। कई परिवार डुबान का पानी उबालकर उपयोग कर रहे हैं। यह स्थिति इसलिए भी गंभीर मानी जा रही है क्योंकि हाल के वर्षों में जिले में जल जगार जैसे बड़े अभियान चलाए गए, जिनका उद्देश्य जल संरक्षण और जल प्रबंधन को लेकर जागरूकता फैलाना था। लेकिन जिस गंगरेल जलाशय को जल संरक्षण और जल उपलब्धता का मॉडल बताया गया, उसी के किनारे बसे गांवों में लोग पानी के लिए भटक रहे हैं।

               नल लगे हैं, लेकिन पानी नहीं आता
ग्रामीण मोहनलाल ध्रुव ने बताया कि गांव में नल-जल योजना के तहत हर घर तक पाइपलाइन और नल लगाए गए हैं, लेकिन उनमें पानी नहीं आता। उन्होंने कहा कि गांव के लोगों को करीब एक किलोमीटर दूर डुबान क्षेत्र से पानी लाना पड़ता है। उन्होंने बताया कि गांव तक पहुंचने का रास्ता भी बेहद खराब है और पहाड़ी कच्चे मार्ग से होकर गुजरना पड़ता है। यदि किसी की तबीयत खराब हो जाए या कोई आपात स्थिति आ जाए तो लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। वहीं मोहिनी बाई ध्रुव ने बताया कि गांव में दो पानी टंकियां बनी हुई हैं, लेकिन दोनों लंबे समय से बंद पड़ी हैं। कई बार शिकायत करने के बाद भी कोई स्थायी समाधान नहीं हुआ। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव के समय जनप्रतिनिधि गांव पहुंचते हैं, लेकिन बाद में समस्या की ओर ध्यान नहीं दिया जाता।

               योजनाएं कागजों में, प्यास जमीन पर
ग्रामीणों का कहना है कि नल-जल योजना गांव के लिए अब सफेद हाथी साबित हो रही है। लाखों रुपये खर्च कर बनाई गई व्यवस्था का लाभ लोगों तक नहीं पहुंच रहा। गांव में घर-घर नल जरूर दिखते हैं, लेकिन उनमें पानी नहीं आता। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब गंगरेल जैसे विशाल जलाशय के किनारे बसे गांवों तक पेयजल नहीं पहुंच पा रहा, तो दूरस्थ और पहाड़ी इलाकों की स्थिति कैसी होगी।

                 कलेक्टर ने जांच की बात कही
इस संबंध में कलेक्टर अविनाश मिश्रा ने कहा कि मामले की जानकारी मिली है और संबंधित क्षेत्र की जांच कराई जाएगी।