दुर्गेश साहू धमतरी। 6 जुलाई 1998... यही वह दिन था जब रायपुर जिले से अलग होकर धमतरी को नए जिले का दर्जा मिला। लोगों ने उम्मीद की थी कि अब प्रशासन उनके दरवाजे तक पहुंचेगा, विकास की रफ्तार बढ़ेगी, बड़े संस्थान आएंगे और धमतरी प्रदेश के अग्रणी जिलों में शामिल होगा। लेकिन 28 साल बाद भी जिले के सामने वही सवाल खड़े हैं, जो उसके गठन के समय थे। रेल परियोजना अधूरी है, मेडिकल कॉलेज अब भी सपना है, उच्च शिक्षा के लिए युवाओं का पलायन जारी है, रोजगार के अवसर सीमित हैं और शहर ट्रैफिक जाम से जूझ रहा है। इसी वजह से जिले में वर्षों से एक चर्चा होती रही है कि धमतरी कहीं विकास का मॉडल बनने के बजाय अधिकारियों का कथित प्रशिक्षण केंद्र तो नहीं बन गया। यहां कई अधिकारी प्रशिक्षण लेकर बड़े पदों तक पहुंचे, लेकिन जिले को स्थायी विकास की कितनी सौगात मिली, यह सवाल आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
126 साल पुरानी रेल की विरासत, लेकिन आज भी इंतजार
धमतरी की पहचान कभी नैरोगेज रेल लाइन से होती थी। वर्ष 1900 में शुरू हुई यह रेल सेवा जिले की जीवनरेखा मानी जाती थी। किसानों, व्यापारियों और यात्रियों के लिए यह सबसे बड़ा साधन थी। ब्रॉडगेज परियोजना के नाम पर वर्ष 2017 में नैरोगेज लाइन बंद कर दी गई। लोगों को भरोसा था कि कुछ वर्षों में आधुनिक रेल सेवा शुरू हो जाएगी, लेकिन लगभग नौ साल बाद भी ट्रेन की सीटी धमतरी स्टेशन पर नहीं गूंजी। लोगों की एक और चिंता यह है कि प्रस्तावित रेल लाइन रायपुर मुख्य स्टेशन तक सीधी नहीं पहुंचेगी। ऐसे में लोगों का सवाल है कि जब राजधानी तक सीधी रेल सुविधा ही नहीं मिलेगी तो इसका पूरा लाभ जिले को कैसे मिलेगा?
           सड़कें वहीं, शहर कई गुना आगे
पिछले 28 वर्षों में धमतरी की आबादी बढ़ी, वाहन कई गुना बढ़ गए, लेकिन सड़कें उसी अनुपात में विकसित नहीं हुईं। सदर बाजार, मकई चौक, रत्नाबांधा, बस स्टैंड और प्रमुख बाजारों में रोज जाम लगता है। ई-रिक्शा, अव्यवस्थित पार्किंग और संकरी सड़कें लोगों की परेशानी बढ़ा रही हैं। वर्षों से सड़क चौड़ीकरण की चर्चा होती है, लेकिन आज तक कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं देता।
   स्वास्थ्य व्यवस्था... जिला अस्पताल या रेफर सेंटर?
धमतरी जिला अस्पताल सिर्फ जिले के लिए ही नहीं बल्कि गरियाबंद, कांकेर, बालोद और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के हजारों मरीजों के लिए सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है। इसके बावजूद विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, मशीनों का लंबे समय तक बंद रहना, मरीजों का रायपुर रेफर होना और दवाइयों की कमी जैसी शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। करीब 28 साल बाद भी जिले को मेडिकल कॉलेज नहीं मिल सका। ऐसे में गंभीर मरीजों को आज भी बेहतर इलाज के लिए दूसरे शहरों पर निर्भर रहना पड़ता है।
          उच्च शिक्षा के लिए हर साल पलायन
धमतरी में इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज और बड़े व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों का अभाव आज भी महसूस किया जाता है। हर वर्ष हजारों छात्र-छात्राएं रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर और दूसरे राज्यों का रुख करते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह अतिरिक्त बोझ बन जाता है।

       रोजगार की तलाश में बाहर जा रहे युवा
कृषि प्रधान जिला होने के बावजूद यहां बड़े उद्योग स्थापित नहीं हो सके। स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सीमित हैं। इसी कारण बड़ी संख्या में युवा रोजगार की तलाश में रायपुर, भिलाई, दुर्ग, हैदराबाद, पुणे और दूसरे राज्यों तक जाने को मजबूर हैं।
पर्यटन की अपार संभावनाएं, लेकिन योजनाओं का इंतजार
गंगरेल बांध, सिहावा, मुरूमसिल्ली, रुद्रेश्वर महादेव, उदंती क्षेत्र और घने वन होने के बावजूद धमतरी पर्यटन के क्षेत्र में अपेक्षित पहचान नहीं बना सका। यदि योजनाबद्ध तरीके से पर्यटन विकसित किया जाता तो हजारों लोगों को स्थानीय रोजगार मिल सकता था।

             धमतरी की ताकत कृषि है
युवा पत्रकार अभिषेक पाण्डेय का कहना है कि धमतरी की सबसे बड़ी पूंजी उसकी उपजाऊ भूमि, जल संसाधन और मेहनती किसान हैं।उनका मानना है कि केवल मेडिकल कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज की मांग से आगे बढ़कर कृषि विश्वविद्यालय, आधुनिक कृषि अनुसंधान केंद्र और एग्री-प्रोसेसिंग उद्योगों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। वे कहते हैं कि विकास केवल भवन बनाने से नहीं होता, बल्कि उन संस्थानों से लोगों के जीवन में आने वाले बदलाव से होता है। यदि कृषि क्षेत्र में वैज्ञानिक निवेश हो तो धमतरी पूरे प्रदेश के लिए मॉडल बन सकता है।

   28 साल में उम्मीद के मुताबिक विकास नहीं हुआ
शहरवासी रौनक अग्रवाल का कहना है कि जिला बनने के समय लोगों को उम्मीद थी कि धमतरी विकास के नए आयाम स्थापित करेगा, लेकिन आज महासमुंद, कवर्धा, कांकेर और कोंडागांव जैसे जिले कई मामलों में आगे दिखाई देते हैं। उनका मानना है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और शीर्ष प्रशासनिक पदों पर अनुभवी अधिकारियों की सीमित तैनाती के कारण जिले को वह गति नहीं मिल सकी जिसकी उम्मीद थी। उनका कहना है कि धमतरी पूरे प्रदेश को पानी और सिंचाई देता है, लेकिन बड़े उद्योग और निवेश आज भी यहां नहीं पहुंचे।

      जनता की उम्मीदों का पूरा लाभ नहीं मिला
वरिष्ठ पत्रकार रंजीत छाबड़ा का कहना है कि जिला बनाने के लिए जनता ने लंबा संघर्ष किया था, लेकिन उस संघर्ष का पूरा लाभ लोगों को नहीं मिला। उनके अनुसार रेल, पर्यटन, स्वास्थ्य, सड़क और व्यापार जैसे क्षेत्रों में जिले की क्षमता के अनुरूप काम नहीं हुआ। वे कहते हैं कि धमतरी की सड़कें, स्वास्थ्य सेवाएं और व्यापारिक गतिविधियां आज भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकी हैं।

          28 साल बाद सबसे बड़ा सवाल...
धमतरी जिला बनने के पीछे उद्देश्य केवल प्रशासनिक सीमाएं बदलना नहीं था, बल्कि विकास को गांव-गांव तक पहुंचाना था। करीब तीन दशक बाद भी यदि रेल, मेडिकल कॉलेज, उच्च शिक्षा, रोजगार, ट्रैफिक, पर्यटन और उद्योग जैसे मुद्दे लोगों की प्राथमिक चिंता बने हुए हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर विकास की रफ्तार कहां थम गई? धमतरी आज भी संभावनाओं से भरा जिला है। अब जरूरत उन संभावनाओं को योजनाओं से निकालकर धरातल पर उतारने की है, ताकि आने वाले वर्षों में यह जिला केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि विकास के परिणामों से पहचाना जाए।