दुर्गेश साहू धमतरी। 6 जुलाई 1998... धमतरी के इतिहास का वह दिन, जब वर्षों का संघर्ष सफल हुआ और रायपुर जिले से अलग होकर धमतरी को नए जिले का दर्जा मिला। यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि हजारों लोगों की उम्मीदों, जनआंदोलन और लंबे संघर्ष की जीत थी। नागरिक जिला संघर्ष समिति के नेतृत्व में करीब एक माह तक क्रमिक भूख हड़ताल चली। आखिरकार शासन ने मांग स्वीकार की और धमतरी को अलग जिले का दर्जा मिला। उस समय पूरे जिले में उत्सव जैसा माहौल था। जगह-जगह मिठाइयां बांटी गईं, लोगों ने एक-दूसरे को बधाई दी और इसे धमतरी के इतिहास का सबसे गौरवपूर्ण दिन माना गया। समय बीतता गया और धमतरी ने विकास की यात्रा में 28 वर्ष पूरे कर लिए। लेकिन इस वर्ष स्थापना दिवस अपेक्षाकृत शांत नजर आया। जिले के गठन की वर्षगांठ पर न कोई बड़ा सार्वजनिक आयोजन दिखाई दिया और न ही उस ऐतिहासिक दिन को व्यापक स्तर पर याद किए जाने की तस्वीर सामने आई। जिले के वरिष्ठ नागरिकों और सामाजिक लोगों का कहना है कि जिस दिन धमतरी को अपनी अलग पहचान मिली, उस दिन को केवल कैलेंडर की एक तारीख बनाकर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। यह दिन नई पीढ़ी को उस जनसंघर्ष और इतिहास से परिचित कराने का अवसर भी है, जिसके कारण धमतरी को अलग जिला बनने का गौरव मिला। गौरतलब है कि जिले में विभिन्न राष्ट्रीय पर्व, महापुरुषों की जयंती, पुण्यतिथि और अन्य अवसरों पर प्रशासन, जनप्रतिनिधियों, राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की ओर से विविध कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। ऐसे में कई लोगों के बीच यह चर्चा भी रही कि धमतरी के स्थापना दिवस पर भी जिले के इतिहास और संघर्ष को याद करने के लिए कोई सामूहिक कार्यक्रम आयोजित होना चाहिए था। स्थापना दिवस केवल एक औपचारिक तिथि नहीं, बल्कि धमतरी की पहचान, संघर्ष और आत्मगौरव का प्रतीक है। यही कारण है कि इस बार 28 वर्ष पूरे होने के बावजूद जिले में इसे लेकर अपेक्षित माहौल नहीं दिखने पर लोगों के बीच सवाल भी उठे। अब सवाल यह है कि क्या आने वाले वर्षों में धमतरी का स्थापना दिवस केवल सरकारी अभिलेखों तक सीमित रहेगा, या फिर इसे जिले के इतिहास और जनसंघर्ष के सम्मान के रूप में हर वर्ष गरिमापूर्ण ढंग से मनाने की परंपरा विकसित की जाएगी?
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