धमतरी में इन दिनों शहर के चौक-चौराहों, चाय दुकानों और गलियों में एक ही चर्चा है विकास के बड़े-बड़े दावे तो खूब किए जा रहे हैं, लेकिन जमीन पर तस्वीर कुछ और ही नजर आ रही है। इसी चर्चा का ताजा उदाहरण बन गई है शहर के हृदय स्थल घड़ी चौक की नगर घड़ी। कुछ दिन पहले जिस नगर घड़ी को मरम्मत के बाद पूरे तामझाम के साथ दोबारा चालू किया गया था, उसे विकास की घड़ी बताया गया। कहा गया कि अब यह घड़ी उसी तरह बिना रुके चलेगी, जैसे शहर में विकास की रफ्तार चलेगी। यह भी कहा गया कि जो कुछ सालों से अटका था, वह अब थमने वाला नहीं है। लेकिन मरम्मत के कुछ ही दिनों बाद नगर घड़ी की हालत शहर में हो रही उसी चर्चा को मजबूत करती नजर आ रही है। फिलहाल घड़ी चौक पर लगी चारों घड़ियां अलग-अलग समय दिखा रही हैं। कहीं कांटे रुके हुए हैं, कहीं आगे निकल गए हैं, तो कहीं पीछे चल रहे हैं। मरम्मत के कुछ दिनों तक ठीक चलने के बाद घड़ी का इस तरह भटकना, निरंतर विकास और तेज रफ्तार जैसे शब्दों को खोखला साबित करता दिख रहा है। शहर के लोग अब इसे सिर्फ तकनीकी खराबी नहीं मान रहे, बल्कि इसे उसी मानसिकता से जोड़कर देख रहे हैं, जहां योजनाएं और घोषणाएं पहले होती हैं, लेकिन मजबूती और गुणवत्ता बाद में सवालों में आ जाती है। चर्चा यह भी है कि जिस तरह पहले भी घड़ी कुछ समय चलकर बंद हो जाती थी, अब वही हालात दोहराते नजर आ रहे हैं। खास बात यह है कि घड़ी सुधारने वाले के लिए घोषित 21 हजार रुपये का इनाम दे दिया गया है, लेकिन घड़ी का समय फिर से ठहराने और भटकाने लगा है। शहर में यह सवाल भी उठ रहा है कि इनाम पहले और स्थायित्व बाद में क्यों? 
महापौर से फोन पर चर्चा में उन्होंने बताया कि इनामी राशि का भुगतान कर दिया गया है, जबकि मरम्मत कार्य का पूरा भुगतान अभी नहीं किया गया है। तकनीकी खामी सामने आने पर मैकेनिक को फिर से बुलाकर घड़ी को दुरुस्त कराया जाएगा।

लेकिन शहर की चर्चा इससे आगे जा चुकी है। लोग कह रहे हैं कि यह सिर्फ घड़ी की बात नहीं है, बल्कि उस सोच की झलक है, जहां विकास के दावे तो तेज रफ्तार से चलते हैं, लेकिन जमीन पर काम अक्सर अटक-अटक कर चलता है। जिस घड़ी को विकास का प्रतीक बताया गया था, वही घड़ी आज शहर में चल रही दावे बनाम हकीकत की बहस का प्रतीक बनती जा रही है। 
 

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