दुर्गेश साहू धमतरी। नगर निगम धमतरी पर बिजली बिल का बढ़ता बकाया कोई अचानक पैदा हुई समस्या नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक ढिलाई और वित्तीय प्रबंधन की कमजोरी का परिणाम है। एसटीपी, वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट और स्ट्रीट लाइट जैसी जरूरी सेवाओं का विद्युत भुगतान लंबे समय तक नियमित नहीं हो सका, जिससे निगम पर करीब 12 करोड़ 50 लाख रुपये का बकाया हो गया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब बकाया धीरे-धीरे बढ़ रहा था, तब जिम्मेदार अधिकारियों और तत्कालीन जनप्रतिनिधियों ने समय रहते ठोस कदम क्यों नहीं उठाए। यदि पहले ही वित्तीय अनुशासन और भुगतान व्यवस्था पर ध्यान दिया गया होता, तो नगर निगम को इतनी बड़ी देनदारी का सामना नहीं करना पड़ता।हाल के दिनों में इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल हुई है। छत्तीसगढ़ शासन द्वारा नगर निगम के अधीन वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट से जुड़े लंबित बिजली देयक के भुगतान के लिए करीब 6 करोड़ 34 लाख 97 हजार 590 रुपये की राशि समायोजित कर दी गई। इस भुगतान से शहर की जल आपूर्ति व्यवस्था पर मंडरा रहा संकट फिलहाल टल गया है और संयंत्र के संचालन को स्थायित्व मिला है। गौर करने वाली बात यह भी है कि वर्तमान महापौर रामू रोहरा को पद संभाले अभी करीब एक वर्ष होने को है। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि वर्षों से जमा हुई समस्या का समाधान अब जाकर शुरू हुआ है। निगम स्तर पर शासन से समन्वय और लगातार प्रयासों के चलते यह भुगतान संभव हो पाया, जिसे शहर के लिए राहत के रूप में देखा जा रहा है।
शहर में यह चर्चा भी है कि यदि पूर्व में जिम्मेदारों ने समय रहते पहल की होती, तो निगम को इतनी बड़ी आर्थिक चुनौती का सामना नहीं करना पड़ता। वहीं, मौजूदा नेतृत्व द्वारा समस्या को गंभीरता से लेते हुए समाधान की दिशा में कदम उठाना सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
अब सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक बार की राहत साबित होगी, या नगर निगम भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए स्थायी वित्तीय व्यवस्था और जवाबदेही की प्रणाली विकसित कर पाएगा।
कहां हुई चूक?
नगर निगम पर बिजली बिल का बकाया वर्षों तक बढ़ता रहा, लेकिन न तो समय पर भुगतान की ठोस योजना बनी और न ही जिम्मेदारी तय हुई। यह स्थिति प्रशासनिक ढिलाई और वित्तीय अनुशासन की कमी को उजागर करती है।
राहत की शुरुआत, लेकिन चुनौती बाकी
वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट के लंबित भुगतान से जल आपूर्ति व्यवस्था को राहत मिली है, लेकिन नगर निगम के सामने अब भी बकाया राशि और वित्तीय प्रबंधन को लेकर बड़ी चुनौती बनी हुई है।
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