मिट्टी से आकार ले रहे विघ्नहर्ता, कारीगरों के हाथों में दिख रही भक्ति और कला
संजय देवांगन धमतरी। गणेश उत्सव को लेकर तैयारियां धीरे-धीरे जोर पकड़ने लगी हैं। बाजारों में जहां गणेश प्रतिमाओं की मांग बढ़ने लगी है, वहीं मूर्तिकार भी भगवान गणेश की आकर्षक प्रतिमाओं को आकार देने में जुट गए हैं। कारीगरों के हाथों में मिट्टी आती है और देखते ही देखते वही मिट्टी गणपति बप्पा की सुंदर प्रतिमा का रूप लेने लगती है
मूर्ति बनाने का काम केवल मिट्टी को आकार देने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे कई दिनों की मेहनत, कलात्मक सोच और बारीकी से किया गया काम शामिल होता है। सबसे पहले प्रतिमा का ढांचा तैयार किया जाता है। इसके बाद शरीर के अलग-अलग हिस्सों को आकार दिया जाता है और चेहरे की बनावट पर विशेष ध्यान दिया जाता है। गणेश जी की सूंड, कान, आंखें, मुकुट और हाथों की आकृति को बेहद सावधानी से तैयार किया जाता है
कारीगरों का कहना है कि भगवान गणेश की प्रतिमा बनाना उनके लिए सिर्फ रोजी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि आस्था और कला से जुड़ा काम भी है। एक प्रतिमा को तैयार करने में कई चरणों से गुजरना पड़ता है। प्रतिमा को सही आकार देने के बाद उसे अच्छी तरह सुखाया जाता है इसके बाद रंग-रोगन और सजावट का काम शुरू होता है
🌱 पर्यावरण को लेकर भी बढ़ रही जागरूकता
इस बार पर्यावरण-अनुकूल गणेश प्रतिमाओं को लेकर भी जागरूकता देखने को मिल रही है। देश के कई हिस्सों में मिट्टी और प्राकृतिक सामग्री से बनी प्रतिमाओं को बढ़ावा देने की अपील की जा रही है। हालिया रिपोर्टों में भी मिट्टी की प्रतिमाओं को पर्यावरण के लिहाज से बेहतर विकल्प बताया गया है
मूर्तिकारों के लिए मौसम भी बड़ी चुनौती रहता है बारिश के दौरान प्रतिमाओं को सुरक्षित रखना पड़ता है, क्योंकि नमी के कारण मिट्टी की प्रतिमाओं को नुकसान हो सकता है। देश के कुछ प्रमुख मूर्ति निर्माण क्षेत्रों में इस वर्ष भारी बारिश से कारीगरों को नुकसान की खबरें भी सामने आई हैं
🙏 हर प्रतिमा के पीछे कई दिनों की मेहनत
एक सुंदर गणेश प्रतिमा जब बाजार में पहुंचती है तो लोगों को केवल उसका अंतिम रूप दिखाई देता है, लेकिन उसके पीछे कारीगरों की कई दिनों की मेहनत छिपी होती है मिट्टी तैयार करने से लेकर प्रतिमा को अंतिम रूप देने और रंग भरने तक हर चरण में धैर्य और मेहनत की जरूरत होती है
हेमंत कुम्भकार बताते हैं कि गणेश उत्सव का मौसम उनके लिए पूरे साल के महत्वपूर्ण समय में से एक होता है। इस दौरान अलग-अलग आकार और डिजाइन की प्रतिमाओं की मांग रहती है। छोटी प्रतिमाओं से लेकर बड़ी प्रतिमाओं तक को ग्राहक अपनी पसंद और आवश्यकता के अनुसार खरीदते हैं
चेहरे की खूबसूरती पर सबसे ज्यादा ध्यान
मूर्तिकारों के लिए गणेश प्रतिमा का चेहरा सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। आंखों की बनावट, मुस्कान, सूंड और मुकुट की डिजाइन पर विशेष ध्यान दिया जाता है। रंग भरने के बाद प्रतिमा का स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है और मिट्टी से बनी आकृति आकर्षक गणेश प्रतिमा में बदल जाती है
धमतरी में भी गणेश उत्सव की तैयारियों के साथ मूर्तिकारों के हाथों में तेजी दिखाई देने लगी है। कहीं मिट्टी को आकार दिया जा रहा है, तो कहीं तैयार प्रतिमाओं पर रंग चढ़ाया जा रहा है। कार्यशालाओं में दिनभर कारीगर अपने काम में व्यस्त नजर आ रहे हैं।
परंपरा, रोजगार और आस्था का संगम
गणेश प्रतिमा बनाने की कला कई कारीगर परिवारों के लिए परंपरा के साथ रोजगार का माध्यम भी है पीढ़ियों से चली आ रही इस कला को नई पीढ़ी भी आगे बढ़ा रही है। बदलते समय के साथ प्रतिमाओं के डिजाइन में बदलाव जरूर आया है, लेकिन भगवान गणेश की प्रतिमा बनाने की मूल कला आज भी कारीगरों के हाथों में जीवित है।
:मिट्टी के एक साधारण ढेर से भगवान गणेश की भव्य प्रतिमा तक का यह सफर बताता है कि आस्था के साथ जब हुनर और मेहनत जुड़ती है, तो कारीगरों के हाथों से सिर्फ मूर्ति नहीं, बल्कि श्रद्धा का स्वरूप तैयार होता है। गणपति बप्पा मोरया।

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